गुरुवार, 12 सितंबर 2013

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धर्मान्तरण के लिए क्या केवल ईसाई जिम्मेदार हैं?




३ सितम्बर, २०११ के जनसत्ता के पृष्ठ ६ पर. 
मैंने इसके विरोध में जनसत्ता में अपना मत भेजा 
जिसे नहीं छापा गया ..
आज अनायास यह फ़ाइल हाथ आ गयी ... 
संशोधित कर आप सब के लिए दे रहा हूँ ..



३ सितम्बर, २०११ के जनसत्ता के पृष्ठ ६ पर शंकर शरण जी की सेक्युलरिज्म की परिभाषा को लेकर उपजी चिंताओं से वाकीफ़ हुआ. हिंदुत्व, उसके धर्म ग्रंथों और साधु-बाबाओं के प्रति उनकी नतमस्तकी आस्था का भी ज्ञान हुआ. उनके द्वारा लगाये गए तमाम आरोप-प्रत्यारोप और पक्ष-विपक्ष पर बहस की जबरदस्त गुंजाईश है, जिस पर निश्चित रूप से अन्य गुणीजन विचार करेंगे पर मेरा मन जिस बात पर अटका, वह है- धर्मान्तरण से सम्बंधित! 

शंकर शरण जी ने लिखा है- “यहाँ अवैध धर्मान्तरण कराने वाले विदेशी ईसाई को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है, जबकि अपने धर्म में रहने की अपील करने वाले हिंदू समाजसेवी को साम्प्रदायिक कहकर लांछित किया जाता है.” यहाँ प्रश्न है कि धर्मान्तरण यदि अवैध है तो इसके लिए जिम्मेदार क्या केवल ‘विदेशी ईसाई’ ही है या फिर आपका तथाकथित ‘हिंदू समाजसेवी’ भी? धर्मान्तरण अवैध क्यों है? हिंदू समाज की गल-घोंटू जकडबंदी से मुक्त होना या किसी को मुक्त कराना क्या अपराध है? और अपने धर्म में रहने की अपील करने वाले, सदियों से दलितों को अपने अमानवीय अत्याचारों से आक्रांत करने वाले हिंदू किस तरह समाजसेवी हैं? 

आप जिस महान हिंदू धर्म की दुहाई दे रहे हैं उसके कौन लोग धर्मान्तरण कर रहे हैं और ये लोग धर्मान्तरण करने को क्यों मजबूर हैं? वे कौनसे कारण हैं जिनकी वजह से ये लोग धर्मान्तरण कर रहे हैं? इसकी जड़ में कहीं आपका मनुवादी आतंक तो नहीं? वास्तविक अपराधी कहीं ‘अपने धर्म में रहने की अपील करने वाला हिंदू समाजसेवी’ ही तो नहीं? 

जिस मनुवादी सोच ने हिंदू समाज के जातिगत ढांचे को निर्मित किया है क्या उसने स्वयं धर्मान्तरण के लिए पर्याप्त ‘स्पेस’ नहीं छोड़ दिया है? जिस तरह की अमानवीय क्रूरता, असमानता, असुरक्षा और शुद्र्ता मनुवादी सोच ने पैदा की है क्या वह स्वयं इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? जिस क्रूर जातिगत ढांचे में इस देश के बहुतायत को मंदिर में प्रवेश का अधिकार न हो, सड़क पर चलने का अधिकार न हो, कुए-तालाब से पानी भरने का अधिकार न हो, सामाजिक उत्सव मानाने का अधिकार न हो, विवाह में घोड़ी पर बैठने का अधिकार न हो, ब्राह्मणों और ठाकुरों के घरों से सामने से गुजरने का अधिकार न हो, वो क्यों न ऐसे घिनौने हिंदुत्व की निर्मम बैडीयां काट कर स्वाधीन हो जाये? जिनके संघर्ष, प्रतिरोध और हक को कुचलने के लिए उनकी बस्तियां की बस्तियां जलाई जाती हों, सामूहिक नरसंहार किये जाते हों और उनके आत्मबल को तोडने के लिए उनकी बहु-बेटियों को हवस का शिकार बना कर, डायन साबित करके नंगा करके गाँव में घुमा-घुमा कर मारा जाता हो, वो लोग क्यों न ऐसे घिनौने हिंदुत्व से मुक्त हों?

अपने जिन्दा रहने और समान रूप से विकास करने के मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करने का अधिकार सब को है, अगर जिन्दा रहने और समान रूप से विकास करने के मौलिक अधिकार का हनन कोई धर्म करता है तो कोई क्यों न ऐसे धर्म को ठोकर मारे? 

आप जिस हिंदुत्व की महानता का बखान कर रहे हैं उसकी क्रूरता का आलम यह है कि आज भी न्यायलय के दलित न्यायाधीश के चेंबर को पवित्र करने के लिए गंगा जल से धुलवाया जाता है! जब दलित न्यायाधीश का यह हश्र है तो रिरीयाती-घिसटती आम दलित जनता का क्या होगा? अगर ऐसी क्रूरता से आतंकित होकर कोई अपना धर्म बदलता है तो इसके लिए ‘विदेशी ईसाई’ नहीं, ‘हिंदू समाजसेवी’ जिम्मेदार है. और ऐसे में यदि उसे साम्प्रदायिक कहा जाये तो क्या गलत है? 

श्रद्धा किस हद तक अंधी हो जाती है यह धर्मान्तरण के लिए केवल ईसाईयों को जिम्मेदार ठहराकर शंकर शरण जी ने साबित कर दिया है. और जिस ‘हिंदू समाजसेवी’ को साम्प्रदायिक कहने से उनको पीड़ा है, सच में शंकर शरण जी की सोच भी यहाँ धर्मान्तरण के लिए केवल ईसाईयों को जिम्मेदार ठहराकर अपने साम्प्रदायिक मंसूबों को उजागर होने से नहीं रोक पाई है.


नन्दकिशोर नीलम, 


बुधवार, 11 सितंबर 2013

महादेवी वर्मा की काव्यानुभूति का सच


महादेवी वर्मा को याद करते हुए..... 

महादेवी वर्मा के जन्मशती वर्ष के शुभारम्भ पर आज हम महादेवी वर्मा के समग्र साहित्यिक योगदान पर बात करने के लिए मिले हैं। मुझे 'महादेवी वर्मा की कविता पर आप लोगों के बीच अपनी अनुभूतियां बांटने का मौका दिया गया है। महादेवी वर्मा पर बहुत लिखा गया है, बहुत शोध हुए हैं। महादेवी के समकीलन कवियों और आलोचकों द्वारा भी उनके काव्य पर विचार हुआ है, आधुनिक और समकालीन आलोचकों में आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिहं जैसे शीर्ष आलोचकों ने भी उनकी कविता पर विचार किया है तो डॉ. रमेशकुंतल मेघ जैसे मनोसौन्दर्यशास्त्री ने भी उनकी कविता की गंभीर पड़ताल की है।

महादेवी वर्मा को अत्यन्त महिमा-मण्डित करके या तो देवी के उच्चतम स्थान पर बिठा दिया गया या अदम्य-अतृप्त वासना की शिकार कहकर उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई गई। ये दोनों ही स्थितियां उनकी कविता की सही समझ के लिए घातक रहीं। बहुत लम्बे समय से आलोचना-जगत महादेवी के अवदान की पुनव्र्याख्या करने से उदासीन रहा। लगभग भुला देने वाली स्थिति! अब तक उनके लिए कुछ रूढ़ धारणाएं ही प्रयोग में ली जा रहीं हैं कि वे दुखवादी हैं, कि वे पीड़ा, करुणा, वेदना और आंसू की कवयित्री हैं, कि वे मरण और रुदन की गायिका हैं, कि उनका काव्य जीवन की अस्वीकृति और नकार का काव्य है।

डॉ. रमेश कुंतल मेघ ने महादेवी वर्मा के काव्य को रहस्यवादी और पारलौकिक नहीं माना, उनके प्रियमत को लोकोत्तर नहीं माना, इसके बावजूद उनका मत है कि- 'महादेवी का जीवन संयत और मर्यादित था जो मनोसामाजिक दबाव झेल रहा था। लेकिन आ. नगेन्द्र, आ. नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. कुमार विमल जैसे चिन्तकों ने उन्हें विशृंखल और अतृप्त वासनाओं की शिकार माना है। नगेन्द्रजी ने तो महादेवी वर्मा के आंसुओं को छायावादी फोड़ों का मवाद तक कह दिया और बदले में रामविलास शर्मा ने उनके आंसुओं को करुणा के उजले आंसू कहा।

कुलमिलाकर महादेवी वर्मा की छवि साहित्य में एक दुखवादी, रहस्यवादी और अलौकिक प्रियतम की प्रेयसी की बनी। इस छवि से किसी को इनकार भी नहीं हो सकता क्योंकि अब तक के प्रकाशित शोधों में भी यही स्थापनाएं सामने आयी हैं। पर मेरी चिन्ताएं कुछ और हैं, मैं बराबर यह सोचता रहा हूं कि महादेवी वर्मा की कविताएं क्या वाकई जीवन की अस्वीकृति की कविताएं हैं? क्या आसूं, पीड़ा, वेदना या मिटने मात्र की बात करने से कोई काव्य जीवन की अस्वीकृति का काव्य हो जाता है? क्या करुणा के आधिक्य मात्र से ही कोई कविता जीवन से परामुख हो जाती है? क्या करुणा के कारण काव्य का सौन्दर्य नष्टï हो जाता है? यदि ऐसा मान लिया जाए तो क्रौंच वध से उत्पन्न आदि कवि का करुणा-श्लोक क्यों आज भी भारतीय वाङ्गमय का आदि छन्द माना जाता है? और फिर संस्कृत साहित्य की उस विराट परम्परा को कहां रखेंगे जिसके प्रतिनिधि भवभूति ने मात्र करुण रस का परिपाक करते हुए केवल दुखान्त नाटक लिखे?

सौन्दर्य की सत्ता अत्यन्त व्यापक है। कलावादी रुझान में सौन्दर्य को केवल इन्द्रियबोध तक सीमित कर दिया गया है जबकि सौन्दर्य प्रकृति, मानव जीवन और ललित कलाओं के आनन्ददायक गुण को कहा जाता है। महादेवी वर्मा भी जयशंकर प्रसाद की तरह प्रेम और सौन्दर्य की कवि हैं। उनकी कविता में जो सौन्दर्य है वह वास्तव में आनन्द का ही पर्याय है। अब प्रश्र यह उठ सकता है कि महादेवी में तो रुदन है, करुणा है, आंसू है और मरण की कामना है तो उनका काव्य आनन्ददायक सौन्दर्य का पर्याय कैसे हो सकता है? इस प्रश्र के उत्तर में यह कथन पर्याप्त है कि 'महादेवी के हृदय में सौन्दर्य, जीवन और प्रेम के लिए विह्वïल आकांक्षा है और यही आकांक्षा उनकी रचनाओं के सहज सौन्दर्य और सरस गेयता का रहस्य है। मनुष्य का सौन्दर्यबोध जितना अधिक विकसित और व्यापक होगा, उसकी मानवीय संवेदना और करुणा उतनी ही अधिक विस्तार पायेेगी, तब वह सौन्दर्य की सत्ता को करुण चित्रण के भीतर से भी पकड़ पाने में समर्थ हो जायेगा, यदि कविता में करुणा और पीड़ा जगाने वाली वस्तु या स्थिति को देखकर हमारे मन में केवल दुख, शोक या घृणा उत्पन्न होती तो आज भवभूति कालकवलित हो चुके होते और विश्व-साहित्य से शेक्सपीयर का नाम भी मिट चुका होता!

वास्तव में पीड़ा या करुणा जगाने वाली वस्तु या स्थिति को देखकर हम उससे प्रेम नहीं करने लगते, हम उस कला से प्रेम करते हैं जो दुख, शोक या पीड़ा के कारणों से घृणा करना सिखाती है। यही वह आधार है जिससे यह कहा जा सकता है कि कला में करुण की परिणति भी सौन्दर्य में ही होती है। इससे यह भी साबित होता है कि करुणा की अतिशयता या आंसुओं की अधिकता के कारण महादेवी की कविता को जीवन से परामुख या जीवन की अस्वीकृति की कविता नहीं कहा जा सकता। हां, इतना जरूर हुआ कि इन अतिशयताओं के कारण उनकी कविता में सहज प्रेम-कविताओं की-सी तीव्रता नहीं आ पायी वरन अस्पष्टïता आ गई जिसे ही 'रहस्य का नाम दे दिया गया।
तो फिर महादेवी की कविता क्या है? डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- 'महादेवी की कविता है जीवन की स्वीकृति की कविता! छायायुग की कविता का मूलस्वर है आस्था और जीवन की स्वीकृति का स्वर! निराला, प्रसाद, पन्त और महादेवी ने इस मूल स्वर को अपनी कविता से सींचा है। महादेवी वर्मा को छोड़कर शेष तीनों कवियों में आस्था और जीवन की स्वीकृति का स्वर मुखर होकर सामने आया है। जबकि महादेवीजी में यह स्वर लगभग मौन है। उसमें एक गोपन है, उस पर एक मनोसामाजिक दबाव है, यानी उनके काव्य में 'अण्डरटोन की अधिकता है। इसी अण्डरटोन को अब तक की आलोचना में 'रहस्य कहा गया है। महादेवी की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति पर झिलमिलाता आवरण है, इस आवरण में से होकर आस्था और विश्वास छनकर प्रभासित हो रहा है-

                                   'गला कर मृत पिण्डों में प्राण, बीज करता असंख्य निर्माण।                              सृष्टि का  ये अमिट विधान, एक मिटने में सौ वरदान। 

जीवन के प्रति ऐसा अडिग विश्वास और उत्कट आस्था रखने वाली महादेवी को जीवन से विरक्त कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने जीवन पर पडऩे वाली काली आंधी और अंधकार को अपनी रागात्मकता से दूर करने की बात अपनी कविता में की है, दीपक उनकी कविता का प्रिय उपादान है जो नयी ऊर्जा और आशा का प्रतीक है। कहीं-कहीं यह दीपक जीवन का प्रतीक बनकर भी आया है जिसका अर्थ कई आलोचकों ने क्षरित जीवन के रूप में लेकर महादेवी को मरण की कवयित्री मान लिया है। जबकि सचाई यह है कि यह दीपक ही है जो मधुर-मधुर जल कर उनके प्रियतम का पथ आलोकित करता है। महादेवी जब सब बुझे दीपक जलाने की बात करती है तो इसका केवल इतना ही अर्थ है कि जीवन के प्रति उनकी अडिग आस्था है। महादेवीजी ने कहा भी है-

                             'सब बुझे दीपक जगा लूं।                                              
               घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी जगा लूं।     
    
यदि ऐसा नहीं है तो फिर वे क्यों कहती हैं-

                              'दीप मेरे जल अकंपित,                                                                                 
                घुल अचंचल!
                सिन्धु का उच्छवास घन है,
                तडि़त, तम का विकल मन है,
                भीति क्या नभ है व्यथा का,                                                                                     
                आंसुओं से सिक्त अंचल।

महादेवी वर्मा की जीवन के प्रति जो आस्था है, ललक और उत्कण्ठा है, विश्वास और स्वीकृति है वह 'दीपशिखा की भूमिका के इस कथन से स्पष्टï हो जाती है- 'जीवन और मरण के इन तूफानी दिनों में रची हुई यह कविता ठीक वैसी ही है जैसे झंझा और प्रलय के' बीच में स्थित मंदिर में जलने वाली निष्कंप दीप-शिखा।

यहां यह कहना अत्यन्त आवश्यक जान पड़ता है कि महादेवी वर्मा की कविता में एक स्पन्दन है। उनकी कविता, जैसा उनका स्वयं का मानना है- झंझा और प्रलय के' बीच में स्थित मंदिर में जलने वाली निष्कंप दीप-शिखा नहीं है। महादेवी वर्मा का जीवन वेदना और पीड़ा के अंधियारे में कांपती जिजीविषा की लौ है।

कांपती लौ कहने के पीछे भी मेरा स्पष्टï उद्देश्य है। महादेवी के काव्य में यह कंपन स्थायी भाव की तरह बसा है। खुद महादेवी की भाषा में चाहे इसे 'स्पंदन कह लें या आलोचक दृष्टिï से कंपन, दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है। उनकी जितनी भी पीड़ा मूलक या वेदना मूलक कविताएं हैं- उनमें यह कंपन आरंभ से अन्त तक विद्यमान है। समूचे छायायुग में यह प्रवृत्ति निराला की 'सरोज स्मृति को छोड़ कर प्रसाद के 'आंसू के पदों के अतिरिक्त कहीं नहीं दिखती। पंत तो इस कंपन से लगभग रीते ही हैं। यह कंपन या स्पंदन ही महादेवी को छायायुग की कविता में विशेष दर्जा दिलाता है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात मैं महादेवी की कविता के संदर्भ में करना चाहता हूं वह यह है कि क्या महादेवी वर्मा की कविता का आलम्बन, जिसे महादेवी ने तुम, करूणेश, अतिथि, नाविक, देव, प्रिय, प्रियतम, पाहुन, पी कह कर संबोधित किया है, वाकई कोई पारलौकिक सत्ता है या वह इस लोक का कोई व्यक्ति है जिसे महादेवी ने अपनी कविताओं के झिलमिल आवरण में अवगुंठित कर दिया है? महादेवी की कविता के कुछ उद्धरणों द्वारा हम देखने का प्रयास करते हैं। महादेवी का एक प्रसिद्घ पद-बन्ध है-
               'हे नभ की दीपावलियों, तुम क्षण भर को बुझ जाना        
                मेरे प्रियतम को भाता है, तम के पर्दे में आना           

इस पद-बंध को क्या मानें? क्या इसका आलम्बन अलौकिक हो सकता है? एक अन्य पद-बन्ध देखिए-

                        'मेरी आहें सोती हैं, इन ओठों की चोटों में,                                                    मेरा सर्वस्व छिपा है, इन दीवानी चोटों में।

यहां गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि यहां पर अध्यात्म और रहस्य थोपा गया है। दोनों ही पद लौकिक पे्रम को ही अभिव्यक्त कर रहे हैं। पहले पद पर गौर करें- महादेवी का जो कोई भी अज्ञात-अलौकिक-अदृश्य प्रियतम है उसे तम के पर्दे यानी अंधकार में आना अच्छा लगता है, चमकते तारों का प्रकाश भी उसे नहीं सुहाता, यदि प्रियतम अज्ञात-अलौकिक-अदृश्य है तो उसके लिए उजाला क्या अंधियारा क्या? कुछ स्वयं महादेवी के व्यक्तित्त्व की गंभीरता (अस्पष्टïता-जटिलता?) और शेष अध्यात्म और रहस्य की लकीर पीटने वालों ने उनकी सहज-सरल कविताओं पर भी रहस्य का जाल बिछा दिया। क्या इन तथाकथित रहस्य गीतों को एक युवा स्त्री की आकांक्षाओं, स्वप्रों और अनुभूतियों के सहज अभिव्यक्त रूप में स्वीकार नहीं कर सकते? क्यों हम महादेवी वर्मा में भी मीरा की-सी आदर्श प्रेममूर्ति  देखना चाहते हैं? क्या प्रसाद के 'आंसू काव्य के लौकिक धरातल की तरह महादेवी के संपूर्ण काव्य का कोई लौकिक धरातल नहीं हो सकता? क्या महादेवी एक स्त्री कवि हैं इसलिए उनके पे्रम का आधार लौकिक नहीं हो सकता या फिर हमारी मध्यकालीन मानसिकता यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि एक स्त्री कवि पुरुषों की तरह अपने प्रेम का इजहार करे? विशेषकर महादेवी जैसी स्त्री जिनके जीवन को लेकर साहित्य में यह विवाद भी चला है कि उनको सुश्री कहकर संबोधित किया जाए या श्रीमती कहकर? यह हमारी असहिष्णुता नहीं तो और क्या है कि एक स्त्री कवि को उसकी कविता से नहीं वैवाहिक स्थिति से पहचाना जाए!

जिस दौर में महादेवी वर्मा की कविताएं रची गईं वह दौर भारतीय जनमानस में द्वंद्व का रहा है। थोथे आदर्शों को नारी जीवन पर थोपा जाना उस समय का सांस्कृतिक शगल था। इस सचाई को महादेवी ने बड़ी गंभीरता से समझा और 'भाभी जैसे पात्र द्वारा नारी जाति की इस त्रासदी को अभिव्यक्त भी किया। ऐसे समय में महादेवी वर्मा जैसी पढ़ी-लिखी महिला, जो एक कवि भी है और एकाकी भी है, जिसने अपने वैवाहिक संबंधों को नकार दिया है और जिसके वैवाहिक-स्तर का सामाजिक तौर पर खुलासा नहीं है, वह प्रेम कविता लिखे तो उस समय के मध्यकालीन संस्कार कैसे सहन करते? महादेवी वर्मा ने इस सचाई को जल्दी से समझ लिया और उनकी कविता ने अभिव्यक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिए एक समाज-स्वीकृत पद्घति अंगीकार कर ली और वह थी परलोक और रहस्य की पद्घति! एक स्त्री का किसी से प्रेम करना और उस प्रेम को कविता का रूप देना उतना आसान नहीं था जितना प्रेम पर अध्यात्म का आवरण डालकर उसे कविता का रूप देना।

स्वयं महादेवी ने स्वीकार किया है कि- 'अलौकिक रहस्यानुभूति भी अभिव्यक्ति में लौकिक ही रहेगी। इस लौकिकता का निर्वहन करने के लिए महादेवी वर्मा के लिए अभिव्यक्ति महत्त्वपूर्ण थी, उसकी विषय-वस्तु महत्त्वपूर्ण थी, अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त प्रतीक और आलम्बन का स्वरूप महत्त्वपूर्ण नहीं थे। डॉ. रमेश कुंतल मेघ का यह कथन इस संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय है-
'नीहार से 'रश्मि चरण तक सत्रह से चौबीस साल तक की इस संघर्षशील युवती कालेज-छात्रा की सृजनात्मक और अनिर्वचनीय अनुभवों वाली कविताओं में शुद्घ वेदान्ती रहस्यवाद तथा उच्च दार्शनिक अध्यात्मवाद थोप देना जबर-जुलम नहीं तो भला क्या है?........अतएव यह ज्यादा न्याय संगत लगता है कि उनके नारी जीवन की मनोकामुक, मनोसामाजिक तथा समाजसांस्कृतिक समस्याएं ही 'नारीत्व की रहस्यमयता' बनीं जिन्हें उनकी कवयित्री ने प्रतीकों और अप्रस्तुतों द्वारा अस्पष्टïत:-अटपटी नयी संध्या भाषा में-अभिव्यक्त किया।

महादेवी अपने गद्य में जितनी मुखर है काव्य में उतनी ही मौन! उनके मौन को, या जिसे मेघजी ने अस्पष्टï-अटपटी भाषा कहा है को ही रहस्यवाद का नाम दिया गया है। उनके मौन के कारण जितना रहस्यवाद उनके काव्य पर आरोपित किया गया उतना ही उससे जीवन का उल्लास और मानवीय पक्ष उपेक्षित होता गया। जहां भी कविता पर रहस्य का आवरण डाल दिया जाता है वहां जीवन की सहजता और लोक तिरोहित हो जाते हैं। कबीर, तुलसी और सूर में सूर इसलिए ज्यादा लोक-संपृक्त हैं क्योंकि उनके यहां रहस्य के स्थान पर लोक की सहज सुलभता है। कबीर और तुलसी में कवि के स्थान पर दार्शनिक की खोज ज्यादा की गई, यह महादेवी वर्मा की कविता के साथ भी हुआ। उन्हें छायायुग की श्रेष्ठï रहस्यवादी कवयित्री के रूप में महिमा मंडित करके उनकी कविता की सहजता और लोक-संपृक्ति का अपहरण किया गया। एक नारी की सहज आशाओं- आकांक्षाओं और अनुभूतियों के केन्द्र में उनकी कविता को न देख कर एक रहस्यवादी साधिका के रहस्यगीतों तक उनकी कविता के उद्देश्य को समेट दिया गया। ज्यादा कुछ बन पड़ा तो बुद्घ के पीड़ा-दर्शन को इनकी कविताओं में देखा गया, पर मूल दृष्टिï यहां भी वही थी, ताबड़तोड़ निष्कर्षों और महान शोधों द्वारा उन्हें पीड़ा और वेदना-दर्शन की श्रेष्ठï कवयित्री के रूप में स्थापित कर दिया गया, रहस्यवादी कवयित्री के रूप में स्थापित किया गया। पर उनके काव्य की सचाई और सहजता इन महान विशेषणों और स्थापनाओं के नीचे दबती चली गयी।

अंतिम बात महादेवी की करुणा की! महादेवी जी की कविता की करुणा का संबंध हमारी मध्ययुगीन और सामंती मानसिकता से है। महादेवी एक सहिष्णु और कोमल स्त्री हैं, उनकी करुणा व्यक्तिपरक या आत्मगत नहीं है वह बहिर्मुखी और समाजपरक भी है। वह 'सामंतीय संस्कारों और आधुनिक संघर्षों के बीच द्वंद्वात्मक समन्वय के लिए जागरुक और आकुल हैं। इसी द्विधा और द्वंद्व के कारण उन्हें सर्वाधिक सामाजिक पलायन तथा गुप्त अस्वीकृतियां करनी पड़ी, उन्हें लम्बी आत्मयातना और गहरी आत्मवेदना भोगनी पड़ी।'  इससे उनकी अभिव्यक्ति को पीड़ा और करुणा का अवलम्ब ग्रहण करना पड़ा। वे खुद पीड़ा और करुणा का पारावार लेकर लोक को पीड़ा से मुक्त करना चाहती थीं। करुणा पे्रम में पलती है। महादेवीजी के प्रेम वर्णन में इद्रिय जनित वासना की जलाने वाली ज्वाला नहीं है वहां तो करुणा कि एक स्निग्ध-सी लौ है जो मधुर-मधुर जलती हुई संपूर्ण लोक के कण-कण में अपना उजियारा फैलाना चाहती है। वह स्वयं जल कर भी मुस्कुराती है और मिट कर पुन: मिटने का ही वरदान मांगती है। प्राणों की मजबूत पकड़ से महादेवी जीवन के प्रति आस्था और अडिग विश्वास को रेखाकिंत करते हुए कहती हैं- 

                          'पर शेष नहीं होगी यह,          
                           मेरे प्राणों की क्रीड़ा                                                                  तुमको पीड़ा में ढूंढा, तुममे ढूंढूगी पीड़ा।
                                                                      

दिनांक 19-3-2006 को महादेवी वर्मा जन्मशती वर्ष के शुभारंभ के अवसर पर 'राजस्थान साहित्य अकादमी 'साहित्य संगम, अलवर के तत्त्वावधान में आयोजित समारोह में दिया गया भाषण फिर आदरणीय विजेंद्र जी इसे कृति ओर मे भी छापा था।

डॉ.नन्दकिशोर नीलम
277, 'कनुप्रिया नेशनल गल्र्स कालेज के सामने, विजय नगर, अलवर (राज.) 301001


रविवार, 23 जून 2013

रामविलास शर्मा निश्चय ही 'आलोचना की दूसरी परम्परा’ के शलाका-पुरूष हैं: डॉ. शिवकुमार मिश्र


डॉ. शिवकुमार मिश्र हिन्दी-आलोचना की मार्क्सवादी धारा के
गहन चिन्तक और उदार आलोचक हैं।
उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य की सैद्धान्तिक आवधारणाओं पर
जो गहन विमर्श किया है, वह अद्वितीय है।
यही नहीं उन्होंने हिन्दी-आलोचना की दूसरी परम्परा
की अवधारणा को भी हिन्दी साहित्य में रूपायित किया।
डॉ. नामवर सिंह की दूरारी परंपरा की तरह उनकी दूरारी परंपरा
किसी का कद छोटा-बड़ा नहीं करती वरन
भारतीय मनीषा और चिन्ताधारा के आधार पर
समाज की जरुरत को देखते हुए उसके
सामाजिक सरोकारों का मूल्यांकन करती है

समय-सयम पर अपने शोध कार्य के लिए मुझे उनका सहयोग मिलता रहा है।
कभी पत्रों के माध्यम से तो कभी फोन पर ही और कभी-कभी साक्षात्कार के माध्यम से। यह साक्षात्कार मई, 1998 में उनके निवास आनन्द, गुजराज में रिकार्ड किया गया था।
यह साक्षात्कार मेरे शोध-प्रबंध में भी प्रकाशित है.

नन्द :- डॉ. साहब मैं 'हिन्दी आलोचना की दूसरी परम्परा और रामविलास शर्मा का आलोचना संसार विषय पर काम कर रहा हूँ। आपने दूसरी परम्परा की अवधारणा के आधार पर कुछ लेख रामविलासजी पर भी लिखे हैं। मैं आपसे पहली बात यह जानना चाहता हूँ कि रामविलासजी की आलोचना का मुख्य आदर्श और प्रतिपाद्य आपकी दृष्टि में क्या है ?

डॉ. मिश्र:-  इस प्रश्न का उत्तर बहुत व्यापक है। डॉ. रामविलास शर्मा की सीमक्षा पर काफी कुछ लिखा गया है - मार्क्सवादियों के द्वारा भी और गैर-मार्क्सवादियों के द्वारा भी। उनके समीक्षा-कार्य पर स्वतंत्र पुस्तकें-शोध प्रबंध भी लिखे गए हैं। आपको उन्हें ध्यान-पूर्वक पढऩा चाहिए। डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना का आदर्श तथा प्रतिपाद्य मेरे विचार से साहित्य की समाज या जन-संदर्भता ही है। जो साहित्य अपने समय, अपने समाज और उसके साधारण जन के जीवंत क्रियाकलापों, संदर्भों, मनोवृत्तियों, आकांक्षाओं तथा संघर्षों से जितना अधिक जुड़ा होता है, वह उतना ही प्रभावशाली होता है। डॉ. रामविलास शर्मा साहित्य की सामाजिक तथा जनप्रतिबद्धता के हामी हैं। कला तथा सौन्दर्य का स्त्रोत भी वे जनता के जीवन में ही मानते हैं।

नन्द :-  रामविलासजी के अध्ययन का आरम्भ ही मार्क्सवादी चिन्तन का परिचय देकर किया जाता है। आपने जो कला तथा सौन्दर्य का स्त्रोत जनता के जीवन का होने की बात रामविलासजी ने कही है यह भी माक्र्सवादी चिन्तन का एक आयाम है। तो क्या आप यह स्वीकार करते हैं कि रामविलासजी माक्र्सवादी दर्शन के अनुगामी हैं ? या फिर यह मानते हैं कि वे भारतीय मनीषा और चिन्ताधारा से अनुप्राणित जन-जन के हित की चिन्ता में रत जन-मानवतावादी विचारक ?

डॉ. मिश्र:-  मार्क्सवाद एक विश्व-दृष्टिकोण है जो हमें संसार तथा समाज और उसके क्रियाकलापों को समझने तथा विश्लेषित करने की दृष्टि देता है। डॉ. रामविलास शर्मा मार्क्सवादी इसलिए हैं कि संसार तथा समाज, जिसमें भारतीय समाज भी है, हिन्दी क्षेत्र और हिन्दी क्षेत्र का साहित्य है, को समझने-समझाने तथा विश्लेषित करने में उन्होंने माक्र्सवादी दृष्टिकोण का विनियोग किया है। मार्क्सवाद के बारे में उनकी जो समझ और सोच है, और उसके आधार पर साहित्य तथा समाज संबंधी जो निष्कर्ष उन्होंने निकाले हैं, जो स्थापनाएँ दी हैं, उनसे हमें जब तब मतभेद हो सकता है, विनियोग सम्बन्धी और समझ सम्बन्धी कुछ गलतियाँ भी हो सकती हैं, जो किसी भी विचारक के संदर्भ में स्वाभाविक हैं, किन्तु इस बारे में भ्राँति नहीं होनी चाहिए कि वे बुनियादी तौर पर मार्क्सवादी विचारक और विश्लेषक हैं। भारतीय मनीषा तथा भारतीय चिन्ताधारा की उनकी समझ उनके मार्क्सवादी दृष्टिकोण पर आधारित है। मार्क्सवाद पर आस्था और भारतीय चिन्ताधारा तथा भारतीय मनीषा से जुडऩा दो अलग बातें नहीं हैं। मार्क्सवादी- मार्क्सवादी-विश्वदृष्टि के प्रति प्रतिबद्ध होकर भी अपने देश की मनीषा और चिन्ताधारा से अलग नहीं होता, वरन् मार्क्सवाद के आलोक में उसका मूल्यांकन करते हुए उसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करता है; उसके उन जीवंत पक्षों को उजागर करता है जो उसे आगे के समयों में भी प्रेरक बनाए रहते हैं। मार्क्सवाद संस्कृति हो या साहित्य, उनके प्रति हमें अंधमोहासक्त नहीं बनाता, वरन् उनके प्रति विवेक सम्मत दृष्टिकोण अपनाने की सीख देता है। डॉ. रामविलास शर्मा का कार्य इसी दिशा में किया गया कार्य है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि उससे कुछेक पहलुओं पर मतभेद हो सकता है, उसमें विनियोग-संबंधी त्रुटियाँ हो सकती हैं, उनकी कुछ स्थापनाएँ विवादास्पद और अमान्य हो सकती हैं, किन्तु वह कार्य मार्क्सवाद की उनकी अपनी समझ पर आधारित कार्य ही है।

नन्द :-  आपकी बात से यह स्पष्ट होता है डॉ. साहब कि रामविलासजी का सारा चिन्तन मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित है लेकिन उन्होंने अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण मार्क्सवाद के उन्हीं तत्त्वों को ग्रहण किया जो समग्र रूप से मानवघाती प्रवृत्तियों का विरोध करते हैं? जैसे उन्होंने मार्क्सवाद की भी कुछ स्थापनाओं को नकारा है तो अब यही माना जाना चाहिए कि उनकी दृष्टि जरूर मार्क्सवादी है पर भारतीय परिवेश और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही उन्होंने आलोचना लिखी है ?

डॉ मिश्र:-  बिल्कुल सही बात है।

नन्द :-   अच्छा, यह बताइये डॉ. साहब आजकल मार्क्सवादी, प्रगतिवादी, प्रगतिशील, समाजवादी, जनवादी इन सब आलोचना-धाराओं का एक घालमेल नजर आता है। क्या ये सब एक ही विचार-सरणि की देन हैं या इनमें कोइ मूलभूत अन्तर हैं ?

डॉ मिश्र:-  ये सारी आलोचनाएँ एक ही विचार-सरणि की आलोचनाएँ हैं। अलग-अलग धाराओं में प्रतिपाद्य के अनुसार बल अलग-अलग बातों पर हो सकता है, किन्तु यह सब एक ही विचार-परम्परा के अन्तर्गत व्याख्यायित हो सकती हैं।

नन्द :-  डॉ. साहब, आपने मार्क्सवादी आलोचना परम्परा को ही हिन्दी आलोचना की दूसरी परम्परा कहा है। तो फिर पहली परम्परा कौनसी है और इन दोनों में क्या मुख्य अन्तर है ?

डॉ.  मिश्र:-  जिसे हम आलोचना की दूसरी परम्परा कहते हैं, उसका अपना तार्किक आधार है। कोई भी आलोचना-दृष्टि हो, वह बुनियादी तौर पर किसी न किसी दार्शनिक दृष्टिकोण पर ही आधारित होती है। दुनिया को देखने समझने के नजरिए के भीतर से ही साहित्य तथा संस्कृति को देखने-समझने का नजरिया जन्म लेता है। जहाँ तक संसार के उपलब्ध दर्शनों की बात है, उन्हें मोटे तौर पर दो विभागों में बांटा जा सकता है - भाववादी-प्रत्ययवादी (Idealistic) दर्शन तथा भौतिकवादी-वस्तुवादी (Materialistic) दर्शन। भाववादी दर्शन विचार या आत्मा जैसी बातों पर बल देते हैं, उन्हें प्राथमिक मानते हैं। भाववादी दर्शन सृष्टि का कारण किसी दैवी, परम सत्ता को मानते हैं - कोई ईश्वर-ब्रह्म, परम प्रत्यय आदि, किन्तु भौतिकवादी दर्शन संसार का अपना वस्तुगत अस्तित्व मानते हैं और उसके मूल या कारण के रूप में किसी परम सत्ता-ईश्वर या ब्रह्म आदि को नहीं मानते। मार्क्सवादी दर्शन का संबंध इसी भौतिकवाद से है जिसे मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। मार्क्सवादी दर्शन से संबंधित किताबों में आप भाववाद तथा द्वन्द्वात्मक-भौतिकवाद के बारे में विस्तार से जान सकते हैं।
      मार्क्स से पहले की विश्व भर की आलोचना या आलोचना-दृष्टियाँ प्रधानत: भाववादी या प्रत्ययवादी दर्शन पर ही आधारित हैं। सम्पूर्ण भारतीय काव्य-शास्त्र का आधार भी यही भाववादी दर्शन है। मार्क्स से पहले भी जब तब विश्व में और भारत में भौतिकवादी विचार परम्परा की अभिव्यक्ति तथा दखल भी होती रही है, किन्तु मूलत: और मुख्यत: पश्चिम और भारत का सारा काव्य शास्त्र भाववादी दार्शनिक दृष्टिकोण पर ही आधारित रहा है।
      पहली बार मार्क्सवाद में भाववादी दर्शन का शास्त्रोक्त तथा वैज्ञानिक तरीके से किया गया प्रतिवाद मिलता है। इसी प्रकार पहली बार मार्क्सवाद पर आधारित आलोचना तथा साहित्य-चिन्तन में पहली बार भाववादी सौन्दर्य शास्त्र, आलोचना शास्त्र या काव्य से सर्वथा भिन्न प्रस्थान बिन्दु मिलते हैं, मार्क्सवादी आलोचना, एक सर्वथा भिन्न दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित आलोचना है। इसी नाते अगर 'दूसरी परम्परा की आलोचना किसी को माना या कहा जा सकता है, वह मार्क्सवादी आलोचना ही है। शेष आलोचना पद्धतियाँ, दृष्टियाँ अलग-अलग बातों पर बल देते हुए भी अपने दार्शनिक आधार पर एक ही भाववादी दर्शन की आलोचनाएँ हैं। वे इसी नाते पहली परम्परा की आलोचनाएँ हैं। दूसरी परम्परा की आलोचना भाववाद के विपरीत भौतिकवादी दर्शन की जमीन पर विकसित मार्क्सवादी आलोचना ही हो सकती है।

नन्द :-  जब भी दूसरी परम्परा की बात आती है तो विवाद नामवरजी की 'दूसरी परम्परा की खोज पुस्तक पर केन्द्रित हो जाता है। इस सन्दर्भ में कुछ कहेंगे ?

डॉ.      मिश्र:-वस्तुत: दूसरी परम्परा की बात शुरू होने का एक इतिहास है। जब डॉ. नामवर सिंह की 'दूसरी परम्परा की खोज किताब प्रकाशित हुई तभी यह सवाल उठा। आचार्य शुक्ल के विपरीत उन्होंने उसमें आचार्य द्विवेदी को दूसरी परम्परा का आलोचक कहा। आचार्य शुक्ल को उन्होंने जो स्थापित, मान्य, चला आ रहा है, उससे जोड़ा और द्विवेदीजी को असहमति, अस्वीकार और स्थापित, मान्य या चले आ रहे के अस्वीकार से संबद्ध किया। द्विवेदीजी का मानक कबीर को माना।
      जब इस तरह आचार्य शुक्ल को एक और आचार्य द्विवेदी को दूसरी परम्परा से उन्होंने जोड़ा तभी मन में यह बात आई कि ये दोनों आलोचक भिन्न परम्पराओं के आलोचक नहीं वरन्ï एक ही परम्परा के आलोचक हैं। बावजूद इसके कि एक तुलसी को वरीयता देता है, दूसरा कबीर को, दोनों की विश्व-दृष्टि, जीवन-दृष्टि एक ही है। एक ही परम्परा में रहते हुए भले ही साहित्यिक मुद्दों पर उनके विचार भिन्न हों, उनकी विश्व-दृष्टि और जीवन-दृष्टि में कोई अन्तर नहीं है।
      तभी यह भी मन में आया कि, अगर दूसरी परम्परा की बात करनी ही है तो दूसरी परम्परा वही हो सकती है जो बुनियादी तौर पर पहली से भिन्न दार्शनिक जमीन पर खड़ी हो। तभी यह स्थापना सामने आई कि प्लेटो से लेकर अब तक का तथा भरत से लेकर अब तक का सारा पश्चिमी और भारतीय-चिन्तन बुनियादी तौर पर प्रत्ययवादी दर्शन की जमीन से किया गया चिन्तन है। बीच-बीच में कुछ अपवाद मिलते हैं। यदि दूसरी परम्परा के साहित्य चिंतन की बात की जाय तो वह वस्तुवादी-भौतिकवादी दार्शनिक जमीन पर विकसित चिन्तन ही होगा और ऐसा साहित्य-चिंतन या ऐसी आलोचना मार्क्सवादी आलोचना ही है।

नन्द :-   मौटे तौर पहली और दूसरी आलोचना परम्परा में क्या अन्तर है ? क्या पहली परम्परा की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो विकसित होती हुई दूसरी परम्परा में भी पूरी शक्ति से जीवित हैं और विकसित भी हो रही हैं ? मतलब यह है कि पहली परम्परा में ऐसा कुछ था जिसे दूसरी परम्परा ने विरासत के रूप में स्वीकार किया ?

डॉ. मिश्र:-  के. दामोदरन की एक किताब है - 'भारतीय चिन्तन परम्परा।' उसे पढ़ें। उन्होंने बताया है कि हमारी प्राचीन वैदिक-औपनिषदिक परम्परा में किस तरह भौतिकवादी चिंतन के अनेक सूत्र हैं। इसके उपरांत उन्होंने बौद्ध-जैन दर्शनों में वस्तुवादी-भौतिकवादी चिंतन के सूत्र बताए हैं जिनमें वैदिक परम्परा का नकार है। लोकायत मत भारत में विकसित पहला भारतीय दार्शनिक चिंतन है जो विशुद्धत: भौतिकवादी है यद्यपि उसका भौतिकवाद यांत्रिक भौतिकवाद है। फिर भी वह भौतिकवादी दर्शन तो है ही। इसी प्रकार पश्चिम में भाववादी दर्शनों के साथ भौतिकवादी दार्शनिक चिन्तन की प्रारम्भ से ही परम्परा रही है। हेगेल भाववादी थे-उन्हीं के तमाम सूत्र लेकर मार्क्स ने अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को रूप दिया। Dialectics तो हेगेल की है जिसका उपयोग मार्क्स ने अपने दर्शन में किया।
      कहने का मतलब है-समूचे विश्व में दर्शन या चिंतन की दो परम्पराएँ रही हैं-भाववादी और भौतिकवादी। भाववादी परम्परा को राजसत्ता का संरक्षण मिला और भौतिकवादी परम्परा को दबाया गया। दमन किया गया। यदि पूर्ववर्ती परम्परा में भौतिकवादी चिंतन नहीं होता तो मार्क्स अपना दर्शन नहीं खड़ा कर सकते थे।
      सारा काव्य शास्त्र-वह भारतीय हो या पश्चिमी, दर्शन की इन्हीं दो जमीनों पर अवस्थित है। साहित्य-चिन्तन, काव्य-चिन्तन या आलोचना में भौतिकवादी दर्शन की जमीन को पुष्ट वैज्ञानिक आधार मार्क्सवादी आलोचना में मिला-वह यहाँ की हो या बाहर की।
      इसी नाते मार्क्सवादी आलोचना को दर्शन की दूसरी परम्परा-अर्थात् भौतिकवादी दर्शन की परम्परा की आलोचना कहा गया है। अब समाजशास्त्रीय, जनवादी आदि आलोचना सरणियों में यदि बुनियादी दृष्टि भौतिकवादी दृष्टि है, तो वे भी दर्शन की दूसरी परम्परा आलोचना कही जाएंगी।
      जहाँ तक मार्क्सवादी आलोचना का अपनी जमीन से जुडऩे का सवाल है, मार्क्सवाद आलोचना में मार्क्सवाद की बुनियादी स्थापनाओं के साथ अपनी परम्परा में जो कुछ प्रगतिशील है, दैवी व्याख्याओं से भिन्न समाज तथा जीवन की वस्तुगत सत्ता को स्वीकार करते हुए कहा गया है, वह सब मार्क्सवादी आलोचना की विरासत है। आचार्य शुक्ल जब कहते हैं कि लोक के भीतर ही कविता या किसी कला का विकास या जन्म होता है, तो वे मार्क्सवाद की स्थापनाओं के एकदम निकट आकर बात करते हैं, इसी नाते बुनियादी तौर पर भाववादी विश्वदृष्टि के होते हुए भी, मार्क्सवादियों में मान्य है। समाज तथा जीवन को ठोस वस्तुगत स्वीकृति के परिपे्रक्ष्य में की जाने वाली कोई भी बात हमें स्वीकार है।

नन्द :-   डॉ. साहब, एक बार डॉ. नन्द किशोर नवल ने मेरे प्रश्न के उत्तर में कहा कि 'डॉ. शर्मा मार्क्सवादी हैं पर उनका मार्क्सवाद विकसनशील न होकर डागमेटिज्म का शिकार है। आप डॉ. नवल के आरोप से कहाँ तक सहमत हैं ?

डॉ. मिश्र:-  रामविलास शर्मा का मार्क्सवाद विकासशील है या रूढ़ (डाग्मेटिस्ट) यह तो अपना-अपना मत है। जिस प्रकार भाववादी विचारकों में-उदारतावादी और कट्टरतावादी हैं, उसी प्रकार मार्क्सवाद में भी उदारतावादी और कट्टरतावादी हैं। यह तो बहस और विचार का मुद्दा है।

नन्द :-   बस एक अन्तिम प्रश्न डॉ. साहब, इतना तो स्पष्ट हो चुका है कि आप रामविलासजी के सारे चिन्तन को दूसरी परम्परा के केन्द्र में ही रखते हैं। अब यह भी बताइये कि क्या रामविलासजी ही इस दूसरी-परम्परा के शलाका-पुरूष हैं ?

डॉ. मिश्र:-  अपनी सीमाओं, अंतर्विरोधों तथा तमाम सारी आलोचनागत असहमतियों के बावजूद डॉ. रामविलास शर्मा निश्चय ही 'आलोचना की दूसरी परम्परा के शलाका-पुरूष हैं। इस बात से कोई मतभेद नहीं हो सकता।


नन्द:-   बहुत-बहुत धन्यवाद डॉ. साहब। आपने मुझे अपनी अपरिमित व्यस्तताओं के भीतर से जो समय दिया है। वह मेरे लिए और मेरे शोध के लिए अत्यन्त मूल्यवान है। हिन्दी-आलोचना की दूसरी परम्परा को लेकर मेरे मन में जो शंकाएँ थी, जो संशय था, आपसे बातचीत करके उनका समाधान हो गया है। पुन: आपका बहुत आभारी हँ।